Thursday, April 29, 2021

धमनियों में असंख्य तितलियां उड़ चलीं


 तुम-मुस्कुराए

मेरे सारे रूमाल सूख गये।


तुमने बोला-धप्पा

मेरा बचपन जीवंत हो उठा।


तुमने किया- विश्वास

मैंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली।


तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता












तुमने सहलाये-कपोल

पलकें मूंद कर भी मैंने ढाई आखर पढ़ लिये।


तुमने लिया-चुम्बन

धमनियों में असंख्य तितलियां उड़ चलीं।


तुमने कहा- 'तुम मेरी हो'

मैंने घरौंदा बांध लिया।


तुमने दी-शक्ति

तमाम विरोध रणछोड़ हो गये।


तुमने-जीता मुझे

कोलम्बस घर लौट गया।


तुमने किया- प्रेम

मैं जड़- चेतन हो गयी।


स्वीकार सकोगे मुझे!

 

स्वीकार सकोगे मुझे

जैसी हूं वैसी ही?


होता होगा न कठिन

तुम्हारे लिए

एक आजाद पसंद 

नादान, पगली-सी

आवारा औरत के साथ

मिलाना कदम।


तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता









चिढ़ होती होगी

वास्तविकता के साथ

उसके निडर प्रयोगों से।


नादानियां उसकी

लगती होगी मुर्खता

सोची-समझी, 

अतः हर बार

लगता होगा जरूरी

उसे कठघरे में लाना।


तरजीही देना  

घुमक्कड़ी अनुभव को

लगती होगी उत्श्रंखलता, 

बहाना लगता होगा,

बंधन तोड़ने का।


हुनर उसके 

लगते होंगे पागलपन

जैसे हर जीनियस को

दिया जाता है उपनाम 'पागल'।


आज़ाद ख्याल उसके

लगती होगी धृष्टता,

आज़ादी औरतजात की

पर्याय जो है चरित्रहीनता के।


असम्भव है तुम्हारे लिए

दंभी समाज

मुझे स्वीकारना

जैसी हूं वैसी ही।


गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...