Wednesday, May 5, 2021

हाथ

             करुणा को आज आफिस से निकलने में काफी देर हो गई। वह घड़ी देखती हुई मेट्रो की तरफ भागी जा रही थी। उसे डर था कि उससे ट्रेन न छूट जाये। वरना आगे लोकल ट्रेन में वह चढ़ ही नहीं पायेगी और घर पहुँचने में रात हो जायेगी।

             पाँव में चोट होने के कारण तेज चलना भी उसके लिए लगभग नामुमकिन था। बहरहाल, मेट्रो का टोकन ले वह स्टेशन पर आ गई। लोगों की भीड़ देखकर उसका दिल सहम गया। उसके मन में भीड़ को देखकर ही एक अनजान डर समा जाता है।

तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल

             मेट्रो का समय हुआ और वह प्लेटफार्म पर आकर रूकी। मेट्रो के अंदर का नजारा और भी भयावह था। पर चढ़ जाने के अलावा करुणा के पास और कोई विकल्प न था। अंदर जाते ही वह एक सुलभ गोश्त में बदल चुकी थी जिसका अहसास उसे थोड़ी ही देर में होने लगा।

             एक-एक करके कुछ हाथ उसकी तरफ बढ़ आए। इतनी दम घोंटू भीड़ थी कि वह अपना शरीर तो क्या विरोध में हाथ भी नहीं हिला पा रही थी। वे हाथ बड़े मज़े से उसके पीछे और आगे का मांस दबोच रहे थे। जिनको कुछ नहीं हाथ आया वे बाकी बचे मांस पर गीदड़ों की तरह लगे पड़े थे।

                 करुणा सांस नहीं ले पा रही थी। अंदर से चीख-रुलाई को रोके वह पागलों की तरह इस हालत से निकलना चाह रही थी। पर ऐसा हो नहीं रहा था। भीड़ के धक्के खाते हुए वह दूसरी तरफ के दरवाजे के करीब पहुंच गई।

             अचानक उसकी नजर दरवाजे के नजदीक खड़े एक लड़के पर पड़ी वह मफलर से अपना मुंह ढके, कान में हेडफोन लगाये गाना सुन रहा था। करुणा ने उसकी तरफ करुण व सजल नैनों से देखा और कहा थोड़ी जगह दे देंगे ताकि मैं ठीक से खड़ी हो सकूं। वह लड़का चाहता तो बगल में सरककर या फिर अपनी जगह देकर करुणा की मदद कर सकता था। पर इनमें से उसने कुछ भी नहीं किया। बस वह अपलक बिना किसी भाव के उसकी तरफ देखता रहा। और, उसकी हालत भी। करुणा खुद को और रोक नहीं पाई, उसकी आँखों से आँसू की बूंद ढुलकने लगी। बस उनकी दृष्टि एक दूसरे पर टिकी रही।


Tuesday, May 4, 2021

शिक्षित अनपढ़

   दिन का सारा काम निपटाकर मुहल्ले की कुछ औरतें गपशप में मशगूल थी। गपशप क्या थी, वही दूसरे की चर्चा दूसरों की निंदा। आज के विषय थे मिस्टर मोहन।

     सोनिया ने कहा - पूरे मुहल्ले में कोई सज्जन हैं तो मिस्टर मोहन ही हैं।

     जया - ये आपने बढ़िया बात कही सोनिया जी। कितने जानकार आदमी हैं बई गोर्ड जी।

     ममता - और नहीं तो क्या। वेद, पुराण, उपनिषद कुछ भी तो न छोड़ा है।

     माया - सुना है रजनीश को फोलो करते हैं। उनकी किताबें भी छान डाली है।

     स्मृति - बड़े ही इंटेलिजेंट हैं। मुँह खोलते हैं तो बस ज्ञान की गंगा बह निकलती है।


     बड़ी अजीब बात थी आज की गपशप में। अमूमन बुराई के शब्दों से सराबोर बातचीत की जगह तारीफों के पुल बाँधें जा रहे थे। मिस्टर मोहन के तो भाग्य खुल गये।उनकी बतों से तो लगता था जैसे काम, क्रोध, मोह, लोभ पर मोहन जी ने टोटल कंट्रोल कर लिया था। ऐसे सज्जन पुरुष के दर्शन तो तो इस कल युग में दुर्लभ ही है।

      तभी अचानक मोहन जी के मकान से होहल्ला की आवाज सुनाई देने लगी। सभी उसी ओर भागे। वे बड़े ज्ञानी , बुद्धिमान सज्जन आंगन में अपनी बीवी पर चप्पलों की बौछार कर रहे थे। और जबान कह रही - " रंडी, साली, एक बात बोलने पर समझ नहीं आती। बनठन कर नौकरी करने की जरूरत न है। चुल्हा चौका देख।


Monday, May 3, 2021

एक का दो

4 अगस्त 2018,  शनिवार

         राई,

              सच पूछो तो अब अहसास होता है कि तुम न होती तो जिन्दगी का सफर बड़ा बोझिल-सा लगता। तुम्हारे साथ जिन्दगी क्या बाँट ली, वह पूरी हो गयी।

              याद है तुम्हें वो चाय की प्याली, खाने की थाली, वह जलेबी-समोसे....। आज तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं राई। मुझे कभी-कभी तुम्हारा यूँ चीजें आधी-आधी बाँट कर खाने की आदत से बड़ी चिढ़ होती थी। अपनी पसंदीदा चीज़ बाँटकर खाने में कोफ्त महसूस होती है। पेटू जो हूं मैं, क्या करता? पर तुम्हें इससे खुशी मिलती इसलिये तुम्हारी खुशी में ही खुद की खुशी ढूंढ लेता था।

तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल
              तुम एक प्याली चाय को आधी पी और मुझे आधी पिलाकर चहक उठती। एक ही थाली में खाना खाकर सुकून से भर जाती। मैं तुम्हें देखकर आत्मिक आनंद से महक उठता था।

              आज वे पल याद आते हैं तो आँखें नम नहीं होती। तुम्हारे प्यार से सराबोर हो चमक उठता हूं। कसम से।

              तुम्हारा अब साथ न होना मुझे अधुरा नहीं करता क्योंकि पूरा तो तूमने मुझे बरसों पहले ही कर दिया था।

              जानती हो, अब जाकर तुम्हारे उस एक का दो करने का मर्म समझ पाया हूं। दरअसल तुम एक का दो महज चीजों का कर रही थी पर वह हमें दो से एक कर रहा था।

              

Sunday, May 2, 2021

ज़िद अभी बाकी है


माना मौसम की तबीयत थोड़ी नासाज़ है
पर जिस्म की हरारत तो अभी बाकी है।

माना गहरे अंधेरे खौफ़जदा करते हैं
पर उजाले की उम्मीद तो अभी बाकी है।















माना टूटता हैं हौसला हर शिकस्त पर
पर जीतने का अरमान तो अभी बाकी है।

माना दुश्मन भी इंसान और है दोस्त भी
पर इंसानियत पर यकीन तो अभी बाकी है।

माना पंखों के कतरन बिखरे हैं जमीं पर
पर उड़ने का ज़िद जुनून तो अभी बाकी है।

Saturday, May 1, 2021

गंगा यात्रा


सड़कें विरान हैं शमशान की तरह

हर दस मिनट में एक कर्णभेदी आवाज़

रुह को हिला जाती हैं।


जिन सड़कों से बड़ा प्रेम रहा करता था

आज अजीब सा डर लगा रहता है।

तस्वीर हेतु आभार मृगेश अधिकारी









केवल अपने बनाये पिंजरे में कैद

अनर्गल एक ही क्रिया दोहराये जा रहे हैं

हर रोज़ हर घड़ी,

दिमाग कब प्रलाप बकने लगता है होश ही नहीं रहता। 


मकान की चारदीवारी से कम हो रहे हैं एक एक खम्बे

जो सुरक्षा का अपनत्व का भरोसा दिया करते थे बिना किसी लाग लपेट के।


उंगलियों ने उन्हें अब गिनना बंद कर दिया है,

जिनके जाने का ग़म खोखला कर रहा है जीने की आस।


बस एक सवाल गूंजता है जह़न में

क्यों? क्यों? क्यों?

क्यों हो रही है ये जबरदस्ती की गंगा यात्रा?


इतनी जल्दी नहीं छुड़ाना था मोह का बंधन,

क्या हो जाता अगर थोड़ा और जगत की माया घेरे रहती,

लेकिन अनजाने ही,

लाखों करोड़ों की संख्या में ये गंगा यात्री 

मुंह फेरे चले जा रहे हैं।

गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...