करुणा को आज आफिस से निकलने में काफी देर हो गई। वह घड़ी देखती हुई मेट्रो की तरफ भागी जा रही थी। उसे डर था कि उससे ट्रेन न छूट जाये। वरना आगे लोकल ट्रेन में वह चढ़ ही नहीं पायेगी और घर पहुँचने में रात हो जायेगी।
पाँव में चोट होने के कारण तेज चलना भी उसके लिए लगभग नामुमकिन था। बहरहाल, मेट्रो का टोकन ले वह स्टेशन पर आ गई। लोगों की भीड़ देखकर उसका दिल सहम गया। उसके मन में भीड़ को देखकर ही एक अनजान डर समा जाता है।
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| तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल |
मेट्रो का समय हुआ और वह प्लेटफार्म पर आकर रूकी। मेट्रो के अंदर का नजारा और भी भयावह था। पर चढ़ जाने के अलावा करुणा के पास और कोई विकल्प न था। अंदर जाते ही वह एक सुलभ गोश्त में बदल चुकी थी जिसका अहसास उसे थोड़ी ही देर में होने लगा।
एक-एक करके कुछ हाथ उसकी तरफ बढ़ आए। इतनी दम घोंटू भीड़ थी कि वह अपना शरीर तो क्या विरोध में हाथ भी नहीं हिला पा रही थी। वे हाथ बड़े मज़े से उसके पीछे और आगे का मांस दबोच रहे थे। जिनको कुछ नहीं हाथ आया वे बाकी बचे मांस पर गीदड़ों की तरह लगे पड़े थे।
करुणा सांस नहीं ले पा रही थी। अंदर से चीख-रुलाई को रोके वह पागलों की तरह इस हालत से निकलना चाह रही थी। पर ऐसा हो नहीं रहा था। भीड़ के धक्के खाते हुए वह दूसरी तरफ के दरवाजे के करीब पहुंच गई।
अचानक उसकी नजर दरवाजे के नजदीक खड़े एक लड़के पर पड़ी वह मफलर से अपना मुंह ढके, कान में हेडफोन लगाये गाना सुन रहा था। करुणा ने उसकी तरफ करुण व सजल नैनों से देखा और कहा थोड़ी जगह दे देंगे ताकि मैं ठीक से खड़ी हो सकूं। वह लड़का चाहता तो बगल में सरककर या फिर अपनी जगह देकर करुणा की मदद कर सकता था। पर इनमें से उसने कुछ भी नहीं किया। बस वह अपलक बिना किसी भाव के उसकी तरफ देखता रहा। और, उसकी हालत भी। करुणा खुद को और रोक नहीं पाई, उसकी आँखों से आँसू की बूंद ढुलकने लगी। बस उनकी दृष्टि एक दूसरे पर टिकी रही।




