Tuesday, June 19, 2018

राजधानी

 
पटरी पर सरपट दौड़ती राजधानी
उसे रोकने या
रद्द करने का
साहस किसमें है?

तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता













सदूर अनाम गाँव का
स्टेशन मास्टर
कुहरे से पटी
ठंड से ठिठुरती सुबह में
दिखा रहा है हरी झंडी।
औकात कहाँ उसकी भी
कि वह “राजधानी” के गुजरते वक्त
ऊंधता रहे नींद में।

तटस्थ हैं सभी
चालक,
गार्ड,
स्टेशन मास्टर,
और
उसके आभिजात्य को अपलक घूरती
आम जनता।

जरूरी है सजगता
क्योंकि सवाल सिर्फ राजधानी का नहीं
और न ही हुकूमत का है,
यह गम्भीर प्रश्न तो
 “ राजनीति ” का है।




  

Monday, June 18, 2018

जादुई मिलन

पीछे छूट गई दुनिया से
बहुत आगे कहीं
रुक-सा गया था वक्त वहीं,
पहले तेरे जज्बातों की मिठास का
अपनेपन से घुलते चले जाना रुह तक,
फिर तेरी उँगलियों के संगीत का
कोई जादुई सुर छेड़ देना मेरे जिस्म पर
ममममम..... जादू ही था तेरा मिलना
जादूई था हमारा मिलन।

Photo by Jonathan Borba from Pexels



















छुए थे मेरे जीवन के हर तार तूने,
जिस तरह न छेड़ी हो कोई राग किसी ने
आज तक,
रोम-रोम मेरा रुहानी संगीत की महफिल
बन चुकी थी।
धुन जिसकी सिर्फ तुझे पता थी।
तूने बजाई भी खूब
एक हुनरमंद कलाकार की मानिद
मैं बजती रही- जैसे न थमना हो मुझे कभी
मममममम.......जादू ही था तेरा मिलना

जादुई था हमारा मिलन।

Friday, June 15, 2018

तेरी-मेरी कहानी!

वादियों के नशे में चूर यह जमीं 
बयां कर पाती जो दास्तान-ए-इश्क
तेरी मेरी,
तो जिन्दगी का गुड़ घुल जाता 
सुनने वालों के मुंह में,

Photo by Taryn Elliott from Pexels


















और दे जाता वह रुमानी अहसास
जिसे पाना नसीब कहते है लोग.
मानो न पा सके तो भी
सुनकर भी कुछ दास्तान 
खुद में रुमानीयत को पा जाना है. 
तेरी मेरी कहानी भी कहलायेगी
मुहब्बत..



Thursday, June 7, 2018

सुधार

    बिंदी और बुधुआ में सदैव शराब को लेकर झगड़ा होता। दोनों भाई-बहन के न कोई आगे था न पीछे। बिंदी तो बहुत पहले ही विधवा हो चुकी थी और बुधुआ ने शादी ही नहीं की थी। उम्र ढलान पर थी इसलिए दोनों खाते-पीते और पड़े रहते।

Photo by Huy Phan from Pexels


    शराब के नशे में बुधुआ दूसरों से कभी-कभार पैसे मांगता और जब बिंदी को यह बात पता चलती तो वह बहुत बिगड़ती। बिंदी को बुधुआ का यूँ ही शराब में पैसे बर्बाद करना बहुत अखरता था। कितनी बार उससे कहा कि शराब छोड़ दे, पर नहीं। रोज कारखाने से लौटते वक्त वह शराब पीकर आता और खाना खाकर सो जाता।

    एक दिन मालूम नहीं क्या हुआ बुधुआ ने शराब नहीं पी। वह घर आया। बिंदी यह देखकर बहुत खुश हुई कि चलो देर-सवेर ही सही, इसे अकल तो आई। उसने बड़े प्रेम से कहा, ‘दादा, खाना परोस दूँ?’ पर बुधुआ ने कहा – ‘नहीं, अभी नहीं। आज चाय पीने का बहुत मन हो रहा है, मैं चाय पीकर आता हूँ। फिर खाना खाऊंगा।’ बिंदी ने मना नहीं किया। बिंदी को मन-ही-मन उसके सुधरने की ललक से खुशी थी।


    पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिंदी घर पर बैठी बुधुआ का इंतेजार कर रही थी। पर बुधुआ नहीं आया। उसकी लाश घर पर आई। किसी परिचित ने बताया कि स्टेशन की चाय की दुकान से चाय पीकर वह लौट ही रहा था कि आती हुई एक ट्रेन ने उसे अपना ग्रास बना लिया। बिंदी मौन हो गई। उसकी पल भर की खुशी अब आँसुओं में बदल चुकी थी। 

हमें माफ करना एलन

हम दें न सके तुम्हें
माँ की गोद,
एक वतन जिसे तुम अपना कह सको,
जिसके गाकर राष्ट्रीय गान
फूल जाती छाती तुम्हारी,
मिटा न सके तुम्हारी भूख
जो महज थोड़े से दूध की थी।

photo credit to thebrooklynrail.com












खोखली मानवता ने
तुम्हें बहा दिया विशाल सागर में,
जैसे बहुत पहले कभी
साँप के दंश से मरे बच्चों को
बहा दिया जाता था,
तुम्हें भी तो डसा
अमानुशता के सर्प ने।
पानी नहीं माँगता साँप का काँटा कभी,
पर इस साँप का डसा तो
शायद नहीं चाहता होगा
मानव जन्म दोबारा ।
जी हाँ,
मानव की प्रगति उत्कर्ष पर है
महत्वकांक्षा आसमान छू रही
और मानवता पर्श पर है।


Tuesday, June 5, 2018

डस्टर

जिन्दगी के ग्रीन बोर्ड पर
जब भी मैंने
रंग-बिरंगी चॉक से 
कुछ लिखा कभी
मिटा दिया तुमने 
शब्दों के डस्टर से उन्हें.

photo credit to wordpress.com









एक बच्चे की तरह
मिटाने में आता इतना आनंद 
कि तुम बिना एक अक्षर पढ़े
बस मिटाते चले जाते.
मैं लिखती - तुम मिटाते,
इस खेल-खेल में
भूल गयी हूं लिखना, 
लिखा था आखिर कब
कुछ याद नहीं है. 
अब तो अकसर 
ग्रीन बोर्ड वह
खाली ही रहता है.


Monday, June 4, 2018

लिंक फेल

    बाबूजी की तबीयत अचानक बिगड़ जाने से घर में हड़कम्प मच गया। हमेशा हँसते-हँसाते बाबूजी को यूँ देखना किसी को भी गँवारा न था। सभी बदहवास, सभी बेचैन।

अम्बूलेंस बुलायी गयी। बिना विलम्ब उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने भी देरी न की। सारी जाँच-पड़ताल, टेस्ट-वेस्ट कर जल्दी नतीजे बताये कि ऑपरेशन करना होगा, दिल का दौरा पड़ा है। पैसे जमा करवा दें।

Photo by Muskan Anand from Pexels


छोटे को छोड़ बाकी दो भाई बाहर रहते थे। छोटे के पास पर्याप्त धन न था। उसने भाइयों को खबर दी। बड़ा-मंझला बैंक की ओर भागे। शायद दिन बुरा था या बाबूजी के दिन पूरे हो आए थे। हर बैंक एक ही कहानी कह रहा था – कम्प्यूटर में कनेक्शन नहीं है। भटक-भटककर पागलों की-सी हालत हो गई। आधुनिक जीवन की सुविधाओं से ज्यादा मजबूरियाँ अब भलीभांति समझ आने लगी।

छोटा डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़या लेकिन पेशे की मजबूरी की हवाला अनुरोध पर भारी पड़ने लगा। यहाँ बाबूजी की अवस्था और खराब होने लगी। बड़े और मंझले ने बैंक की ओर फिर दौड़ लगाई। लेकिन फिर वही जवाब आया ‘लिंक फेल’। वृहस्पतिवार था, अतः गहने भी न बिके।

थककर, हताश होकर घरवालों को फोन पर खबर दी कि पैस ट्रांसफर नहीं कर पा रहे। यहाँ बुरी खबर इंतेजार कर रही थी। बाबूजी नहीं रहे। मातम छा गया।


छोटे के मुँह से घोर निराशा में निकल गया – ‘लिंक फेल’।  

गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...