पटरी पर सरपट दौड़ती राजधानी
उसे रोकने या
रद्द करने का
साहस किसमें है?
सदूर अनाम गाँव का
स्टेशन मास्टर
कुहरे से पटी
ठंड से ठिठुरती सुबह में
दिखा रहा है हरी झंडी।
औकात कहाँ उसकी भी
कि वह “राजधानी” के गुजरते वक्त
ऊंधता रहे नींद में।
तटस्थ हैं सभी
चालक,
गार्ड,
स्टेशन मास्टर,
और
उसके आभिजात्य को अपलक घूरती
आम जनता।
जरूरी है सजगता
क्योंकि सवाल सिर्फ राजधानी का नहीं
और न ही हुकूमत का है,
यह गम्भीर प्रश्न तो
“ राजनीति
” का है।






