Monday, June 28, 2021

गुजारा

 सुबह की पहली किरण

आँगन से निकलती हुई

भीगी मिट्टी की

सोंधी-सोंधी खुशबू से

नींद खुलती है।

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दिन चढता 

भीगी मिट्टी

सूरज की उत्ताप किरणों से

जलती नजर आती है

जलती है,

और जलती है

बार-बार जलती है

जलने की बू आती है

बारह बजते हैं

जलना चरमोत्कर्ष पर होता है।


फिर धीरे-धीरे 

चिंगारी बुझने लगती है

रात बढती है

सिर्फ बढती है।


और फिर 

ठंडे-चूल्हे से निकलता धुआँ

जब दम-घोंटू बन जाता 

तब जी मचलता है

नींद आने लगती है

और पता नहीं कब

और, एक रात गुजर जाती है। 

Sunday, June 27, 2021

स्मृतियों झुरमुट से

 स्मृतियों के झुरमुट से झाँकता 

लडकपन का मन,

फिर ले चला है उस अबोध सफर पर

जहाँ जीवन के प्रत्येक पहलू का

प्रथम सोपान चढा था मैंने।

Photo by Archie Binamira from Pexels







मंदिर वो विद्या के

लेकर आया था

जीवन में मेरे

शिक्षा की पहली किरण,

जो सिखा गयी जीवन जीने की हुनर।

गुरुओं का स्नेहिल स्पर्श,

जो दिखा गया लक्ष्य तक का मार्ग।

सपनों की उन्मुक्त उडान,

जो दे गये उनके साकार करने की हौसला।

खुद पर अटूट भरोसा, 

जो कर गया एक सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण।

प्रथम वसंत का आगमन

जो ला गयी जिन्दगी में खुशनुमा बहार।

शोहरत का अहसास

जो जगा गया भीड से अलग खडे होने का जज्बा। 

प्रत्येक अनुभव 

छू गया था अनबुझे ही।


और, पढा गया था

साहत, सहनशीलता, धैर्य का पाठ

ताकि कमजोर न पडे कदम आगे कहीं

जब संर्धष की घनी घटाओं के बीच

उम्मीद की क्षीण रोशनी भी न पहुँच रही हो,

तब 'परिकथाओं' को सच कर लाने का जुनून

सोने न दे मुझे

उनके मुकम्मल हो जाने तक। 

Saturday, June 26, 2021

गुमसुम रहने दो!

 मैं गुमसुम हूं

मुझे गुमसुम ही रहने दो

पतझड में पत्ते झडते हैं

उन्हें झड जाने दो - रोको नहीं।

Photo by Andrea Piacquadio from Pexels







तुम नहीं जानते

कैसा दर्द होता है?

सूखे पत्तों को टहनी से

लगाए रखए णएँ 

तुम नहीं जानते 

होती है कैसी पीडा

आँसुओं को यूँ ही पी जाने में।

दिल को मेरे

कुछ देर बैठ कर सी लेने दो

मैं गुमसुम हूँ

मुझे गुमसुम ही रहने दो!

Friday, June 25, 2021

प्यार रूठा रहता है...

 रेल रूठा रहता है,

वो सफर रूठा रहता है

उसमें तुम्हारे साथ बिताए पल

रूठे रहते हैं,

और कहते हैं,

इस शहर ने तुम्हें तुम्हारा पहला प्याल दिया

प्यार करना सिखाया

निभाना, जताना सिखाया,

पर आज,

तुम्हारे यहाँ साथ न रहने से

ये शहर रूठा रहता है।

Photo by Jonathan Borba from Pexels











ट्रेन की धडकनों के साथ

मिल जाती थीं हमारी धडकनें

किसने क्या कहा?

किसने क्या सुना?

होश नहीं रहता था

फुरसत भी न थी

एक दूसरे के दिल पढ लेने की लय में,

क्या करूँ, 

अब वह फुरसत रूठा रहता है।


रेल चलेगी, चलती रहेगी, 

सफर भी,

पडाव आते रहेंगे कुछ अंतराल के बाद

धडकनों की आवाज भी गूँजती रहेगी,

पर ट्रेन से झाँकता, 

मेरी एक झलक का इंतेजार करता

वह चेहरा न होगा, 

कब फिर दिखेगा,

हाथों की लकीरें ही जानें,

इसलिए आजकल

मीठी यादों के दर्द में लिपटा,

प्यार रूठा रहता है। 

Thursday, June 24, 2021

तुम क्या गये!!

 तुम क्या गये!

रूठ गयी जिन्दगी मुझसे

दुनिया की नजरों में

हौसला बनकर उभरी थी

परिहास बनकर रह गयी हूं।

Photo by Wendy Wei from Pexels











तुम क्या गये!

घना हो चला है

दर्द का सघन वन।

तुम थे तो 

आँच न आती थी मुझ पर

झुलस रही हूं आज मैं।


तुम क्या गये!

चली गयी मेरी

सारी सकारात्मकता

मेरा हौसला

मेरी हँसी

मेरी खूबसूरती

मेरा जीवन।

Wednesday, June 23, 2021

शब्द प्रेम

तुम शब्द को उछालते हो,

मैं शब्द को अंक में सहेजती हूं।


तुम शब्द को बुद्धि से जलाते हो,

मैं शब्द को मन-मधु पिलाती हूं।

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तुम शब्द को निःसहाय छोड देते हो,

मैं शब्द की सहचरी बन जाती हूं।


पर तुम क्यों जीत जाते हो बार-बार,

जबकि मैं परायज वहन करती हूं।

Tuesday, June 22, 2021

अनचाहा

 सिन्दूर की लाली से दमकता चेहरा,

लाज से सकुचाये अधर,

सिहरन से थिरकता गात,

तुम्हें लुभाते नहीं।

Photo by Amine M'Siouri from Pexels











मेरे चेहरे से तुम्हें जात की बू आती है,

अधरों से अनकहे उल्हाने सुन लेते हो तुम,

गात पर मेरे कई करों की प्रतिलिपि दिखाती है तुम्हें,

तुम्हारे दिमाग की यह नाजायज सन्तान

कतई मंजूर नहीं है मुझे

नहीं/ बिल्कुल भी नहीं!


सीधी मीठी बातें,

प्रेम में सना बाहुपाश,

श्रद्धा की भावना से भीगी दृष्टि,

तुम्हें प्रभावित नहीं करते।


मेरी कही में तुम्हें प्रपंच सुनाई देता है,

बाहुपाश विधर्मी भाषा का फंदा लगता है तुम्हें,

दृष्टि की कपटता तुम साफ भाँप लेते हो,

तुम्हारे मन की गिरह में कैद यह राक्षस, 

कदापि स्वीकार नहीं है मुझे

नहीं/ किंचित भी नहीं!

Monday, June 21, 2021

सफेद साडी

 उस कच्ची उम्र में 

देह पर से रंगीन अभिलाषाओं का उतर जाना

और जबरन

बन जाना एक बेरंग चित्र,

बिन्नी बुआ का।

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नियति की क्रूर क्रीडा

और अबोध लौकिक लालसा के मध्य

खिंच रही थी मौन तलवार,


एक-एक करके

संदूक में

आमरण हो गए थे कैद

बचपन की निश्चिंतता 

ताउम्र श्रृंगार का अधिकार,

रसना का शौक,

तारीफों को पुल,

सखियों के संग हँसी-ठिठोली

यौवन का उफान,

मिलन की रातों की सिलवटे

(जिसे कभी जीया नहीं)

आमोद-आह्लाद

सर्वस्व।


रंगीन-चमकीली नाना प्रकार की साडियों को देख

चमकने वाली आँखे,

अब कोरेपन में भटकने लगी थीं।

Sunday, June 20, 2021

गुमशुदा

 खोना था खो गई हूँ

'अपनों' के,

'रिश्तों' के,

'दायित्वों' के,

'गलतफहमियों' के,

'कटाक्षों' के बीच।

Photo by Nikita Khandelwal from Pexels







अब तो सूरत भी नहीं पहतानी जाती है।

और शायद सीरत भी नहीं।


रूह किसी और की लगती है

विचार ओढे हुए से लगने लगे हैं।

लाखों हथौडों के वार से

हो गया है मूल लापाता।


यकीन है यहाँ से लौटाई संभव नहीं,

हुआ तो अजूबा होगा,

किसी ने जादू की छडी घुमाई होगी।


सुना है ऐसे लापता लोगों की सुनवाई नहीं होती कहीं,

नहीं होती रहीं रपट भी।


Saturday, June 19, 2021

परछाई

 पथराई-सी आँखें

उस राह पर टिकी हैं

जिस राह से 

तुम्हारे आने की है खबर

पर

वह राह सुनसान है।

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हलचल हई

एक दिन उस राह पर

नहीं - शायद

मेरे हृदय में

जब मैंने 

तुम्हारी परछाई को

तुम्हारे साथ देखा

और फिर

मैं खुद का,

अस्तित्व ढूँढने लगी हूँ।



Friday, June 18, 2021

अजनबी, तेरी आवाज

 अजनबी, तेरी आवाज 

दिल के तार छू जाती है,

दस्तक दे जाती है लम्हा-लम्हा सूनी रूह में,

ऐसे में जुबान कुछ कहना नहीं चाहती।

Photo by Andrea Piacquadio from Pexels







होती है चाहत बस इतनी,

शाम-ओ-सहर तेरे लफ्जों का काफिला थमे नहीं,

दिल की मुट्ठी में समेट लूं,

तेरी कही-अनकही यादें।


कबूल हो दुआ मेरी 

तू रहें सदा मेरे पास,

बनकर एक रूहानी आवाज,

यही सिर्फ तेरी पहचान 

मयस्सर हो मुझे।


सूरत के सम्मोहन में क्या रखा है

जो आज हैं कल नहीं।

तेरी आवाज तेरा दिल है,

तेरी आवाज से जुड जाती हूँ

तेरी रूह से, तुझसे।


अजनबी, मेरे लिए

तेरी आवाज ही तू है। 

Thursday, June 17, 2021

हाँ, मैंने मुहब्बत की है!

 तलाश थी, जिस मुहब्बत के अहसास की

वो तुझसे हुई पूरी,

तब तूने जहन को झकझोर कर पुकारा,

'तुम हो बस मेरी'।

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हाँ, कितना सुकून देते हैं ये लफ्ज


ये सच है - तेरी भीवनाओं की बारिश में

मैं भींग चुकी हूं सरापा,

कसम हैं इसे ताउम्र सूखने न दूँगी।


प्रियतम, तेरी छुअन से, 

फिर पा चुकी हूँ यौवन की पगडंडियाँ

मन की गिरह को

खोल रही हूँ अनजने ही।


जानते हो, कानों में कह गया इस बरस का सावन,

कि मोहताज नहीं हैं प्रेम उम्र का,

वह तो आज भी है मनचला।


जागे हैं सोये अरमान

तेरे आने से

जी चाहता है मचल जाए क्षण भर को मन।


छन-छन करती पायलों की रुनझन

कह आए सारी की सारी दुनिया को,

हाँ, मैंने मुहब्बत की है! 

हाँ, मैंने मुहब्बत की है!

हाँ, ये सच है,  मैंने मुहब्बत की है!

Wednesday, June 16, 2021

शापित धरती - शापित मानव

 सोलेमॉन द्वीप के निवासी

नहीं बसते केवल सुदूर दक्षिण में,

घर कर गये हैं वे

प्रत्येक मानव के अंतःकरण में।

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शापित है ये अवनी

शापित हैं मानव 

मानव के ही मुख से निकले श्रापों से

जो उस आहिस्ता-आहिस्ता 

धकेल देता है मृत्यु की ओर।


इस हत्या का

नहीं रहता कोई साक्ष्य

जिससे कि सजा हो हत्यारे को

और वह छूट जाता है बेदाग।  

Tuesday, June 15, 2021

डर-सा लगता है....

 प्यार जताते हो जब तुम 

डर-सा लगता है

आज तुम्हारे दिये हुए दो क्षण प्यार के

कल को दर्द के चार क्षण बनकर चुभेंगे।

photo credit to pixbay







जार-जार हो जाऊंगी मैं

मोहरा बन तुम्हारी बिसात का

झूलूँगी निष्ठुरता के झूले में।


तुम उम्मीदों की गेंद बनाकर

खेलते रहोगे उछाल-उछाल 

बनाते रहोगे भावनाओं का मजाक

तुम्हें हँसी आयेगी

खूब हँसी आयेगी

बहुत हँसी येगी

मुझ पर

मेरी प्यार की सहज बातों पर

मेरी बदसूरती पर।


मैं अपना-सा दिल लिए तब

चिथडों में लिपटी

छिपाती अपनी लाज को

ओट में बीहडों की

छिप जाया करती हूं

ताकि

छिपी रहे सबसे मेरी नग्नता

खास तौर पर

अपनों से

जो मुझे देख रो पडेंगे फूट-फूट

रूह काँप जायेंगी उनकी

विश्वास-तर्क की गाँठ पड जायेगी ढीली तब

मैं कहती हूं

इस तरह आस्था की अरथी उठने से पहले

रहने दो पडा सब ढका-छिपा। 

Monday, June 14, 2021

सुर्खियाँ

 जिन्दगी की पीठ पर

सरसकता है,

अवहेलना का चाबुक,

रिसने लगता है

रफ्ता-रफ्ता

जला हुआ खून।

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आत्मा से आवाज आती है-

'तू मर क्यों नहीं जाती!'


लोगों की नजरों में

लटके रह जाने की अभिलाषा,

बुझा देती है,

स्वाभिमान की आग।


समृद्धि की झूठी तस्वीर को

सीने से चिपकाए,

मैली जाँघ पर ही

बिकने लगी हैं सुर्खियाँ।

Sunday, June 13, 2021

प्यार

ख्वाबों-ख्यालों में डुबा हुआ

बेवक्त-बेपरवाह हंसी बनकर

बेवजह होठों पर खिलता – प्यार।

Photo by How Far
From Home
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सुबह की हल्की धूप

शाम की सुरखी में खनखनाता 

सिहरन की सीमा तक गुदगुदाता – प्यार।


हवा में जिन्दगी-सा लहराता

आधे पढ़े रोमांटिक नोवल की पंक्तियों में 

गुम हो जाता – प्यार।


फिर भी कसक में घुलकर रह जाता

बस ख्यालों का मीठा – प्यार


हकीकत की हथेली पर 

कभी न सिमटता

पास न आता -  प्यार


हाय ! 

क्या भीषण विडंबना,

प्यार को पूरा न पाना

हर जन्म, हर क्षण, हर युग में

अधुरेपन में पूर्णता ढूंढता – प्यार।

Wednesday, May 5, 2021

हाथ

             करुणा को आज आफिस से निकलने में काफी देर हो गई। वह घड़ी देखती हुई मेट्रो की तरफ भागी जा रही थी। उसे डर था कि उससे ट्रेन न छूट जाये। वरना आगे लोकल ट्रेन में वह चढ़ ही नहीं पायेगी और घर पहुँचने में रात हो जायेगी।

             पाँव में चोट होने के कारण तेज चलना भी उसके लिए लगभग नामुमकिन था। बहरहाल, मेट्रो का टोकन ले वह स्टेशन पर आ गई। लोगों की भीड़ देखकर उसका दिल सहम गया। उसके मन में भीड़ को देखकर ही एक अनजान डर समा जाता है।

तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल

             मेट्रो का समय हुआ और वह प्लेटफार्म पर आकर रूकी। मेट्रो के अंदर का नजारा और भी भयावह था। पर चढ़ जाने के अलावा करुणा के पास और कोई विकल्प न था। अंदर जाते ही वह एक सुलभ गोश्त में बदल चुकी थी जिसका अहसास उसे थोड़ी ही देर में होने लगा।

             एक-एक करके कुछ हाथ उसकी तरफ बढ़ आए। इतनी दम घोंटू भीड़ थी कि वह अपना शरीर तो क्या विरोध में हाथ भी नहीं हिला पा रही थी। वे हाथ बड़े मज़े से उसके पीछे और आगे का मांस दबोच रहे थे। जिनको कुछ नहीं हाथ आया वे बाकी बचे मांस पर गीदड़ों की तरह लगे पड़े थे।

                 करुणा सांस नहीं ले पा रही थी। अंदर से चीख-रुलाई को रोके वह पागलों की तरह इस हालत से निकलना चाह रही थी। पर ऐसा हो नहीं रहा था। भीड़ के धक्के खाते हुए वह दूसरी तरफ के दरवाजे के करीब पहुंच गई।

             अचानक उसकी नजर दरवाजे के नजदीक खड़े एक लड़के पर पड़ी वह मफलर से अपना मुंह ढके, कान में हेडफोन लगाये गाना सुन रहा था। करुणा ने उसकी तरफ करुण व सजल नैनों से देखा और कहा थोड़ी जगह दे देंगे ताकि मैं ठीक से खड़ी हो सकूं। वह लड़का चाहता तो बगल में सरककर या फिर अपनी जगह देकर करुणा की मदद कर सकता था। पर इनमें से उसने कुछ भी नहीं किया। बस वह अपलक बिना किसी भाव के उसकी तरफ देखता रहा। और, उसकी हालत भी। करुणा खुद को और रोक नहीं पाई, उसकी आँखों से आँसू की बूंद ढुलकने लगी। बस उनकी दृष्टि एक दूसरे पर टिकी रही।


Tuesday, May 4, 2021

शिक्षित अनपढ़

   दिन का सारा काम निपटाकर मुहल्ले की कुछ औरतें गपशप में मशगूल थी। गपशप क्या थी, वही दूसरे की चर्चा दूसरों की निंदा। आज के विषय थे मिस्टर मोहन।

     सोनिया ने कहा - पूरे मुहल्ले में कोई सज्जन हैं तो मिस्टर मोहन ही हैं।

     जया - ये आपने बढ़िया बात कही सोनिया जी। कितने जानकार आदमी हैं बई गोर्ड जी।

     ममता - और नहीं तो क्या। वेद, पुराण, उपनिषद कुछ भी तो न छोड़ा है।

     माया - सुना है रजनीश को फोलो करते हैं। उनकी किताबें भी छान डाली है।

     स्मृति - बड़े ही इंटेलिजेंट हैं। मुँह खोलते हैं तो बस ज्ञान की गंगा बह निकलती है।


     बड़ी अजीब बात थी आज की गपशप में। अमूमन बुराई के शब्दों से सराबोर बातचीत की जगह तारीफों के पुल बाँधें जा रहे थे। मिस्टर मोहन के तो भाग्य खुल गये।उनकी बतों से तो लगता था जैसे काम, क्रोध, मोह, लोभ पर मोहन जी ने टोटल कंट्रोल कर लिया था। ऐसे सज्जन पुरुष के दर्शन तो तो इस कल युग में दुर्लभ ही है।

      तभी अचानक मोहन जी के मकान से होहल्ला की आवाज सुनाई देने लगी। सभी उसी ओर भागे। वे बड़े ज्ञानी , बुद्धिमान सज्जन आंगन में अपनी बीवी पर चप्पलों की बौछार कर रहे थे। और जबान कह रही - " रंडी, साली, एक बात बोलने पर समझ नहीं आती। बनठन कर नौकरी करने की जरूरत न है। चुल्हा चौका देख।


Monday, May 3, 2021

एक का दो

4 अगस्त 2018,  शनिवार

         राई,

              सच पूछो तो अब अहसास होता है कि तुम न होती तो जिन्दगी का सफर बड़ा बोझिल-सा लगता। तुम्हारे साथ जिन्दगी क्या बाँट ली, वह पूरी हो गयी।

              याद है तुम्हें वो चाय की प्याली, खाने की थाली, वह जलेबी-समोसे....। आज तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं राई। मुझे कभी-कभी तुम्हारा यूँ चीजें आधी-आधी बाँट कर खाने की आदत से बड़ी चिढ़ होती थी। अपनी पसंदीदा चीज़ बाँटकर खाने में कोफ्त महसूस होती है। पेटू जो हूं मैं, क्या करता? पर तुम्हें इससे खुशी मिलती इसलिये तुम्हारी खुशी में ही खुद की खुशी ढूंढ लेता था।

तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल
              तुम एक प्याली चाय को आधी पी और मुझे आधी पिलाकर चहक उठती। एक ही थाली में खाना खाकर सुकून से भर जाती। मैं तुम्हें देखकर आत्मिक आनंद से महक उठता था।

              आज वे पल याद आते हैं तो आँखें नम नहीं होती। तुम्हारे प्यार से सराबोर हो चमक उठता हूं। कसम से।

              तुम्हारा अब साथ न होना मुझे अधुरा नहीं करता क्योंकि पूरा तो तूमने मुझे बरसों पहले ही कर दिया था।

              जानती हो, अब जाकर तुम्हारे उस एक का दो करने का मर्म समझ पाया हूं। दरअसल तुम एक का दो महज चीजों का कर रही थी पर वह हमें दो से एक कर रहा था।

              

Sunday, May 2, 2021

ज़िद अभी बाकी है


माना मौसम की तबीयत थोड़ी नासाज़ है
पर जिस्म की हरारत तो अभी बाकी है।

माना गहरे अंधेरे खौफ़जदा करते हैं
पर उजाले की उम्मीद तो अभी बाकी है।















माना टूटता हैं हौसला हर शिकस्त पर
पर जीतने का अरमान तो अभी बाकी है।

माना दुश्मन भी इंसान और है दोस्त भी
पर इंसानियत पर यकीन तो अभी बाकी है।

माना पंखों के कतरन बिखरे हैं जमीं पर
पर उड़ने का ज़िद जुनून तो अभी बाकी है।

Saturday, May 1, 2021

गंगा यात्रा


सड़कें विरान हैं शमशान की तरह

हर दस मिनट में एक कर्णभेदी आवाज़

रुह को हिला जाती हैं।


जिन सड़कों से बड़ा प्रेम रहा करता था

आज अजीब सा डर लगा रहता है।

तस्वीर हेतु आभार मृगेश अधिकारी









केवल अपने बनाये पिंजरे में कैद

अनर्गल एक ही क्रिया दोहराये जा रहे हैं

हर रोज़ हर घड़ी,

दिमाग कब प्रलाप बकने लगता है होश ही नहीं रहता। 


मकान की चारदीवारी से कम हो रहे हैं एक एक खम्बे

जो सुरक्षा का अपनत्व का भरोसा दिया करते थे बिना किसी लाग लपेट के।


उंगलियों ने उन्हें अब गिनना बंद कर दिया है,

जिनके जाने का ग़म खोखला कर रहा है जीने की आस।


बस एक सवाल गूंजता है जह़न में

क्यों? क्यों? क्यों?

क्यों हो रही है ये जबरदस्ती की गंगा यात्रा?


इतनी जल्दी नहीं छुड़ाना था मोह का बंधन,

क्या हो जाता अगर थोड़ा और जगत की माया घेरे रहती,

लेकिन अनजाने ही,

लाखों करोड़ों की संख्या में ये गंगा यात्री 

मुंह फेरे चले जा रहे हैं।

Thursday, April 29, 2021

धमनियों में असंख्य तितलियां उड़ चलीं


 तुम-मुस्कुराए

मेरे सारे रूमाल सूख गये।


तुमने बोला-धप्पा

मेरा बचपन जीवंत हो उठा।


तुमने किया- विश्वास

मैंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली।


तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता












तुमने सहलाये-कपोल

पलकें मूंद कर भी मैंने ढाई आखर पढ़ लिये।


तुमने लिया-चुम्बन

धमनियों में असंख्य तितलियां उड़ चलीं।


तुमने कहा- 'तुम मेरी हो'

मैंने घरौंदा बांध लिया।


तुमने दी-शक्ति

तमाम विरोध रणछोड़ हो गये।


तुमने-जीता मुझे

कोलम्बस घर लौट गया।


तुमने किया- प्रेम

मैं जड़- चेतन हो गयी।


स्वीकार सकोगे मुझे!

 

स्वीकार सकोगे मुझे

जैसी हूं वैसी ही?


होता होगा न कठिन

तुम्हारे लिए

एक आजाद पसंद 

नादान, पगली-सी

आवारा औरत के साथ

मिलाना कदम।


तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता









चिढ़ होती होगी

वास्तविकता के साथ

उसके निडर प्रयोगों से।


नादानियां उसकी

लगती होगी मुर्खता

सोची-समझी, 

अतः हर बार

लगता होगा जरूरी

उसे कठघरे में लाना।


तरजीही देना  

घुमक्कड़ी अनुभव को

लगती होगी उत्श्रंखलता, 

बहाना लगता होगा,

बंधन तोड़ने का।


हुनर उसके 

लगते होंगे पागलपन

जैसे हर जीनियस को

दिया जाता है उपनाम 'पागल'।


आज़ाद ख्याल उसके

लगती होगी धृष्टता,

आज़ादी औरतजात की

पर्याय जो है चरित्रहीनता के।


असम्भव है तुम्हारे लिए

दंभी समाज

मुझे स्वीकारना

जैसी हूं वैसी ही।


गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...