सुबह की पहली किरण
आँगन से निकलती हुई
भीगी मिट्टी की
सोंधी-सोंधी खुशबू से
नींद खुलती है।
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| photo credit pixbay from pexel |
दिन चढता
भीगी मिट्टी
सूरज की उत्ताप किरणों से
जलती नजर आती है
जलती है,
और जलती है
बार-बार जलती है
जलने की बू आती है
बारह बजते हैं
जलना चरमोत्कर्ष पर होता है।
फिर धीरे-धीरे
चिंगारी बुझने लगती है
रात बढती है
सिर्फ बढती है।
और फिर
ठंडे-चूल्हे से निकलता धुआँ
जब दम-घोंटू बन जाता
तब जी मचलता है
नींद आने लगती है
और पता नहीं कब
और, एक रात गुजर जाती है।

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