Thursday, April 29, 2021

स्वीकार सकोगे मुझे!

 

स्वीकार सकोगे मुझे

जैसी हूं वैसी ही?


होता होगा न कठिन

तुम्हारे लिए

एक आजाद पसंद 

नादान, पगली-सी

आवारा औरत के साथ

मिलाना कदम।


तस्वीर हेतु आभार इशीता दत्ता









चिढ़ होती होगी

वास्तविकता के साथ

उसके निडर प्रयोगों से।


नादानियां उसकी

लगती होगी मुर्खता

सोची-समझी, 

अतः हर बार

लगता होगा जरूरी

उसे कठघरे में लाना।


तरजीही देना  

घुमक्कड़ी अनुभव को

लगती होगी उत्श्रंखलता, 

बहाना लगता होगा,

बंधन तोड़ने का।


हुनर उसके 

लगते होंगे पागलपन

जैसे हर जीनियस को

दिया जाता है उपनाम 'पागल'।


आज़ाद ख्याल उसके

लगती होगी धृष्टता,

आज़ादी औरतजात की

पर्याय जो है चरित्रहीनता के।


असम्भव है तुम्हारे लिए

दंभी समाज

मुझे स्वीकारना

जैसी हूं वैसी ही।


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