सड़कें विरान हैं शमशान की तरह
हर दस मिनट में एक कर्णभेदी आवाज़
रुह को हिला जाती हैं।
जिन सड़कों से बड़ा प्रेम रहा करता था
आज अजीब सा डर लगा रहता है।
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| तस्वीर हेतु आभार मृगेश अधिकारी |
केवल अपने बनाये पिंजरे में कैद
अनर्गल एक ही क्रिया दोहराये जा रहे हैं
हर रोज़ हर घड़ी,
दिमाग कब प्रलाप बकने लगता है होश ही नहीं रहता।
मकान की चारदीवारी से कम हो रहे हैं एक एक खम्बे
जो सुरक्षा का अपनत्व का भरोसा दिया करते थे बिना किसी लाग लपेट के।
उंगलियों ने उन्हें अब गिनना बंद कर दिया है,
जिनके जाने का ग़म खोखला कर रहा है जीने की आस।
बस एक सवाल गूंजता है जह़न में
क्यों? क्यों? क्यों?
क्यों हो रही है ये जबरदस्ती की गंगा यात्रा?
इतनी जल्दी नहीं छुड़ाना था मोह का बंधन,
क्या हो जाता अगर थोड़ा और जगत की माया घेरे रहती,
लेकिन अनजाने ही,
लाखों करोड़ों की संख्या में ये गंगा यात्री
मुंह फेरे चले जा रहे हैं।

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