Monday, May 3, 2021

एक का दो

4 अगस्त 2018,  शनिवार

         राई,

              सच पूछो तो अब अहसास होता है कि तुम न होती तो जिन्दगी का सफर बड़ा बोझिल-सा लगता। तुम्हारे साथ जिन्दगी क्या बाँट ली, वह पूरी हो गयी।

              याद है तुम्हें वो चाय की प्याली, खाने की थाली, वह जलेबी-समोसे....। आज तुम्हें कुछ बताना चाहता हूं राई। मुझे कभी-कभी तुम्हारा यूँ चीजें आधी-आधी बाँट कर खाने की आदत से बड़ी चिढ़ होती थी। अपनी पसंदीदा चीज़ बाँटकर खाने में कोफ्त महसूस होती है। पेटू जो हूं मैं, क्या करता? पर तुम्हें इससे खुशी मिलती इसलिये तुम्हारी खुशी में ही खुद की खुशी ढूंढ लेता था।

तस्वीर हेतु आभार अंतर्जाल
              तुम एक प्याली चाय को आधी पी और मुझे आधी पिलाकर चहक उठती। एक ही थाली में खाना खाकर सुकून से भर जाती। मैं तुम्हें देखकर आत्मिक आनंद से महक उठता था।

              आज वे पल याद आते हैं तो आँखें नम नहीं होती। तुम्हारे प्यार से सराबोर हो चमक उठता हूं। कसम से।

              तुम्हारा अब साथ न होना मुझे अधुरा नहीं करता क्योंकि पूरा तो तूमने मुझे बरसों पहले ही कर दिया था।

              जानती हो, अब जाकर तुम्हारे उस एक का दो करने का मर्म समझ पाया हूं। दरअसल तुम एक का दो महज चीजों का कर रही थी पर वह हमें दो से एक कर रहा था।

              

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