दिन का सारा काम निपटाकर मुहल्ले की कुछ औरतें गपशप में मशगूल थी। गपशप क्या थी, वही दूसरे की चर्चा दूसरों की निंदा। आज के विषय थे मिस्टर मोहन।
सोनिया ने कहा - पूरे मुहल्ले में कोई सज्जन हैं तो मिस्टर मोहन ही हैं।
जया - ये आपने बढ़िया बात कही सोनिया जी। कितने जानकार आदमी हैं बई गोर्ड जी।
ममता - और नहीं तो क्या। वेद, पुराण, उपनिषद कुछ भी तो न छोड़ा है।
माया - सुना है रजनीश को फोलो करते हैं। उनकी किताबें भी छान डाली है।
स्मृति - बड़े ही इंटेलिजेंट हैं। मुँह खोलते हैं तो बस ज्ञान की गंगा बह निकलती है।
बड़ी अजीब बात थी आज की गपशप में। अमूमन बुराई के शब्दों से सराबोर बातचीत की जगह तारीफों के पुल बाँधें जा रहे थे। मिस्टर मोहन के तो भाग्य खुल गये।उनकी बतों से तो लगता था जैसे काम, क्रोध, मोह, लोभ पर मोहन जी ने टोटल कंट्रोल कर लिया था। ऐसे सज्जन पुरुष के दर्शन तो तो इस कल युग में दुर्लभ ही है।
तभी अचानक मोहन जी के मकान से होहल्ला की आवाज सुनाई देने लगी। सभी उसी ओर भागे। वे बड़े ज्ञानी , बुद्धिमान सज्जन आंगन में अपनी बीवी पर चप्पलों की बौछार कर रहे थे। और जबान कह रही - " रंडी, साली, एक बात बोलने पर समझ नहीं आती। बनठन कर नौकरी करने की जरूरत न है। चुल्हा चौका देख।

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