हम
दें न सके तुम्हें
माँ
की गोद,
एक
वतन जिसे तुम अपना कह सको,
जिसके
गाकर राष्ट्रीय गान
फूल
जाती छाती तुम्हारी,
मिटा
न सके तुम्हारी भूख
जो
महज थोड़े से दूध की थी।
खोखली
मानवता ने
तुम्हें
बहा दिया विशाल सागर में,
जैसे
बहुत पहले कभी
साँप
के दंश से मरे बच्चों को
बहा
दिया जाता था,
तुम्हें
भी तो डसा
अमानुशता
के सर्प ने।
पानी
नहीं माँगता साँप का काँटा कभी,
पर
इस साँप का डसा तो
शायद
नहीं चाहता होगा
मानव
जन्म दोबारा ।
जी
हाँ,
मानव
की प्रगति उत्कर्ष पर है
महत्वकांक्षा
आसमान छू रही
और
मानवता पर्श पर है।

No comments:
Post a Comment