Thursday, June 7, 2018

सुधार

    बिंदी और बुधुआ में सदैव शराब को लेकर झगड़ा होता। दोनों भाई-बहन के न कोई आगे था न पीछे। बिंदी तो बहुत पहले ही विधवा हो चुकी थी और बुधुआ ने शादी ही नहीं की थी। उम्र ढलान पर थी इसलिए दोनों खाते-पीते और पड़े रहते।

Photo by Huy Phan from Pexels


    शराब के नशे में बुधुआ दूसरों से कभी-कभार पैसे मांगता और जब बिंदी को यह बात पता चलती तो वह बहुत बिगड़ती। बिंदी को बुधुआ का यूँ ही शराब में पैसे बर्बाद करना बहुत अखरता था। कितनी बार उससे कहा कि शराब छोड़ दे, पर नहीं। रोज कारखाने से लौटते वक्त वह शराब पीकर आता और खाना खाकर सो जाता।

    एक दिन मालूम नहीं क्या हुआ बुधुआ ने शराब नहीं पी। वह घर आया। बिंदी यह देखकर बहुत खुश हुई कि चलो देर-सवेर ही सही, इसे अकल तो आई। उसने बड़े प्रेम से कहा, ‘दादा, खाना परोस दूँ?’ पर बुधुआ ने कहा – ‘नहीं, अभी नहीं। आज चाय पीने का बहुत मन हो रहा है, मैं चाय पीकर आता हूँ। फिर खाना खाऊंगा।’ बिंदी ने मना नहीं किया। बिंदी को मन-ही-मन उसके सुधरने की ललक से खुशी थी।


    पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। बिंदी घर पर बैठी बुधुआ का इंतेजार कर रही थी। पर बुधुआ नहीं आया। उसकी लाश घर पर आई। किसी परिचित ने बताया कि स्टेशन की चाय की दुकान से चाय पीकर वह लौट ही रहा था कि आती हुई एक ट्रेन ने उसे अपना ग्रास बना लिया। बिंदी मौन हो गई। उसकी पल भर की खुशी अब आँसुओं में बदल चुकी थी। 

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