जिन्दगी के ग्रीन बोर्ड पर
जब भी मैंने
रंग-बिरंगी चॉक से
कुछ लिखा कभी
मिटा दिया तुमने
शब्दों के डस्टर से उन्हें.
जब भी मैंने
रंग-बिरंगी चॉक से
कुछ लिखा कभी
मिटा दिया तुमने
शब्दों के डस्टर से उन्हें.
एक बच्चे की तरह
मिटाने में आता इतना आनंद
कि तुम बिना एक अक्षर पढ़े
बस मिटाते चले जाते.
मैं लिखती - तुम मिटाते,
इस खेल-खेल में
भूल गयी हूं लिखना,
लिखा था आखिर कब
कुछ याद नहीं है.
अब तो अकसर
ग्रीन बोर्ड वह
खाली ही रहता है.
कि तुम बिना एक अक्षर पढ़े
बस मिटाते चले जाते.
मैं लिखती - तुम मिटाते,
इस खेल-खेल में
भूल गयी हूं लिखना,
लिखा था आखिर कब
कुछ याद नहीं है.
अब तो अकसर
ग्रीन बोर्ड वह
खाली ही रहता है.

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