ख्वाबों-ख्यालों में डुबा हुआ
बेवक्त-बेपरवाह हंसी बनकर
बेवजह होठों पर खिलता – प्यार।
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| Photo by How Far From Home from Pexels |
सुबह की हल्की धूप
शाम की सुरखी में खनखनाता
सिहरन की सीमा तक गुदगुदाता – प्यार।
हवा में जिन्दगी-सा लहराता
आधे पढ़े रोमांटिक नोवल की पंक्तियों में
गुम हो जाता – प्यार।
फिर भी कसक में घुलकर रह जाता
बस ख्यालों का मीठा – प्यार
हकीकत की हथेली पर
कभी न सिमटता
पास न आता - प्यार
हाय !
क्या भीषण विडंबना,
प्यार को पूरा न पाना
हर जन्म, हर क्षण, हर युग में
अधुरेपन में पूर्णता ढूंढता – प्यार।

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