Monday, June 21, 2021

सफेद साडी

 उस कच्ची उम्र में 

देह पर से रंगीन अभिलाषाओं का उतर जाना

और जबरन

बन जाना एक बेरंग चित्र,

बिन्नी बुआ का।

Photo credit to indiatoday.in








नियति की क्रूर क्रीडा

और अबोध लौकिक लालसा के मध्य

खिंच रही थी मौन तलवार,


एक-एक करके

संदूक में

आमरण हो गए थे कैद

बचपन की निश्चिंतता 

ताउम्र श्रृंगार का अधिकार,

रसना का शौक,

तारीफों को पुल,

सखियों के संग हँसी-ठिठोली

यौवन का उफान,

मिलन की रातों की सिलवटे

(जिसे कभी जीया नहीं)

आमोद-आह्लाद

सर्वस्व।


रंगीन-चमकीली नाना प्रकार की साडियों को देख

चमकने वाली आँखे,

अब कोरेपन में भटकने लगी थीं।

No comments:

Post a Comment

गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...