उस कच्ची उम्र में
देह पर से रंगीन अभिलाषाओं का उतर जाना
और जबरन
बन जाना एक बेरंग चित्र,
बिन्नी बुआ का।
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नियति की क्रूर क्रीडा
और अबोध लौकिक लालसा के मध्य
खिंच रही थी मौन तलवार,
एक-एक करके
संदूक में
आमरण हो गए थे कैद
बचपन की निश्चिंतता
ताउम्र श्रृंगार का अधिकार,
रसना का शौक,
तारीफों को पुल,
सखियों के संग हँसी-ठिठोली
यौवन का उफान,
मिलन की रातों की सिलवटे
(जिसे कभी जीया नहीं)
आमोद-आह्लाद
सर्वस्व।
रंगीन-चमकीली नाना प्रकार की साडियों को देख
चमकने वाली आँखे,
अब कोरेपन में भटकने लगी थीं।

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