प्यार जताते हो जब तुम
डर-सा लगता है
आज तुम्हारे दिये हुए दो क्षण प्यार के
कल को दर्द के चार क्षण बनकर चुभेंगे।
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जार-जार हो जाऊंगी मैं
मोहरा बन तुम्हारी बिसात का
झूलूँगी निष्ठुरता के झूले में।
तुम उम्मीदों की गेंद बनाकर
खेलते रहोगे उछाल-उछाल
बनाते रहोगे भावनाओं का मजाक
तुम्हें हँसी आयेगी
खूब हँसी आयेगी
बहुत हँसी येगी
मुझ पर
मेरी प्यार की सहज बातों पर
मेरी बदसूरती पर।
मैं अपना-सा दिल लिए तब
चिथडों में लिपटी
छिपाती अपनी लाज को
ओट में बीहडों की
छिप जाया करती हूं
ताकि
छिपी रहे सबसे मेरी नग्नता
खास तौर पर
अपनों से
जो मुझे देख रो पडेंगे फूट-फूट
रूह काँप जायेंगी उनकी
विश्वास-तर्क की गाँठ पड जायेगी ढीली तब
मैं कहती हूं
इस तरह आस्था की अरथी उठने से पहले
रहने दो पडा सब ढका-छिपा।

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