तुम शब्द को उछालते हो,
मैं शब्द को अंक में सहेजती हूं।
तुम शब्द को बुद्धि से जलाते हो,
मैं शब्द को मन-मधु पिलाती हूं।
![]() |
| Photo by cottonbro from Pexels |
तुम शब्द को निःसहाय छोड देते हो,
मैं शब्द की सहचरी बन जाती हूं।
पर तुम क्यों जीत जाते हो बार-बार,
जबकि मैं परायज वहन करती हूं।

No comments:
Post a Comment