जिन्दगी की पीठ पर
सरसकता है,
अवहेलना का चाबुक,
रिसने लगता है
रफ्ता-रफ्ता
जला हुआ खून।
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| Photo by Kat Jayne from Pexels |
आत्मा से आवाज आती है-
'तू मर क्यों नहीं जाती!'
लोगों की नजरों में
लटके रह जाने की अभिलाषा,
बुझा देती है,
स्वाभिमान की आग।
समृद्धि की झूठी तस्वीर को
सीने से चिपकाए,
मैली जाँघ पर ही
बिकने लगी हैं सुर्खियाँ।

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