Tuesday, June 22, 2021

अनचाहा

 सिन्दूर की लाली से दमकता चेहरा,

लाज से सकुचाये अधर,

सिहरन से थिरकता गात,

तुम्हें लुभाते नहीं।

Photo by Amine M'Siouri from Pexels











मेरे चेहरे से तुम्हें जात की बू आती है,

अधरों से अनकहे उल्हाने सुन लेते हो तुम,

गात पर मेरे कई करों की प्रतिलिपि दिखाती है तुम्हें,

तुम्हारे दिमाग की यह नाजायज सन्तान

कतई मंजूर नहीं है मुझे

नहीं/ बिल्कुल भी नहीं!


सीधी मीठी बातें,

प्रेम में सना बाहुपाश,

श्रद्धा की भावना से भीगी दृष्टि,

तुम्हें प्रभावित नहीं करते।


मेरी कही में तुम्हें प्रपंच सुनाई देता है,

बाहुपाश विधर्मी भाषा का फंदा लगता है तुम्हें,

दृष्टि की कपटता तुम साफ भाँप लेते हो,

तुम्हारे मन की गिरह में कैद यह राक्षस, 

कदापि स्वीकार नहीं है मुझे

नहीं/ किंचित भी नहीं!

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