खोना था खो गई हूँ
'अपनों' के,
'रिश्तों' के,
'दायित्वों' के,
'गलतफहमियों' के,
'कटाक्षों' के बीच।
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| Photo by Nikita Khandelwal from Pexels |
अब तो सूरत भी नहीं पहतानी जाती है।
और शायद सीरत भी नहीं।
रूह किसी और की लगती है
विचार ओढे हुए से लगने लगे हैं।
लाखों हथौडों के वार से
हो गया है मूल लापाता।
यकीन है यहाँ से लौटाई संभव नहीं,
हुआ तो अजूबा होगा,
किसी ने जादू की छडी घुमाई होगी।
सुना है ऐसे लापता लोगों की सुनवाई नहीं होती कहीं,
नहीं होती रहीं रपट भी।

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