Monday, June 28, 2021

गुजारा

 सुबह की पहली किरण

आँगन से निकलती हुई

भीगी मिट्टी की

सोंधी-सोंधी खुशबू से

नींद खुलती है।

photo credit pixbay from pexel






दिन चढता 

भीगी मिट्टी

सूरज की उत्ताप किरणों से

जलती नजर आती है

जलती है,

और जलती है

बार-बार जलती है

जलने की बू आती है

बारह बजते हैं

जलना चरमोत्कर्ष पर होता है।


फिर धीरे-धीरे 

चिंगारी बुझने लगती है

रात बढती है

सिर्फ बढती है।


और फिर 

ठंडे-चूल्हे से निकलता धुआँ

जब दम-घोंटू बन जाता 

तब जी मचलता है

नींद आने लगती है

और पता नहीं कब

और, एक रात गुजर जाती है। 

Sunday, June 27, 2021

स्मृतियों झुरमुट से

 स्मृतियों के झुरमुट से झाँकता 

लडकपन का मन,

फिर ले चला है उस अबोध सफर पर

जहाँ जीवन के प्रत्येक पहलू का

प्रथम सोपान चढा था मैंने।

Photo by Archie Binamira from Pexels







मंदिर वो विद्या के

लेकर आया था

जीवन में मेरे

शिक्षा की पहली किरण,

जो सिखा गयी जीवन जीने की हुनर।

गुरुओं का स्नेहिल स्पर्श,

जो दिखा गया लक्ष्य तक का मार्ग।

सपनों की उन्मुक्त उडान,

जो दे गये उनके साकार करने की हौसला।

खुद पर अटूट भरोसा, 

जो कर गया एक सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण।

प्रथम वसंत का आगमन

जो ला गयी जिन्दगी में खुशनुमा बहार।

शोहरत का अहसास

जो जगा गया भीड से अलग खडे होने का जज्बा। 

प्रत्येक अनुभव 

छू गया था अनबुझे ही।


और, पढा गया था

साहत, सहनशीलता, धैर्य का पाठ

ताकि कमजोर न पडे कदम आगे कहीं

जब संर्धष की घनी घटाओं के बीच

उम्मीद की क्षीण रोशनी भी न पहुँच रही हो,

तब 'परिकथाओं' को सच कर लाने का जुनून

सोने न दे मुझे

उनके मुकम्मल हो जाने तक। 

Saturday, June 26, 2021

गुमसुम रहने दो!

 मैं गुमसुम हूं

मुझे गुमसुम ही रहने दो

पतझड में पत्ते झडते हैं

उन्हें झड जाने दो - रोको नहीं।

Photo by Andrea Piacquadio from Pexels







तुम नहीं जानते

कैसा दर्द होता है?

सूखे पत्तों को टहनी से

लगाए रखए णएँ 

तुम नहीं जानते 

होती है कैसी पीडा

आँसुओं को यूँ ही पी जाने में।

दिल को मेरे

कुछ देर बैठ कर सी लेने दो

मैं गुमसुम हूँ

मुझे गुमसुम ही रहने दो!

Friday, June 25, 2021

प्यार रूठा रहता है...

 रेल रूठा रहता है,

वो सफर रूठा रहता है

उसमें तुम्हारे साथ बिताए पल

रूठे रहते हैं,

और कहते हैं,

इस शहर ने तुम्हें तुम्हारा पहला प्याल दिया

प्यार करना सिखाया

निभाना, जताना सिखाया,

पर आज,

तुम्हारे यहाँ साथ न रहने से

ये शहर रूठा रहता है।

Photo by Jonathan Borba from Pexels











ट्रेन की धडकनों के साथ

मिल जाती थीं हमारी धडकनें

किसने क्या कहा?

किसने क्या सुना?

होश नहीं रहता था

फुरसत भी न थी

एक दूसरे के दिल पढ लेने की लय में,

क्या करूँ, 

अब वह फुरसत रूठा रहता है।


रेल चलेगी, चलती रहेगी, 

सफर भी,

पडाव आते रहेंगे कुछ अंतराल के बाद

धडकनों की आवाज भी गूँजती रहेगी,

पर ट्रेन से झाँकता, 

मेरी एक झलक का इंतेजार करता

वह चेहरा न होगा, 

कब फिर दिखेगा,

हाथों की लकीरें ही जानें,

इसलिए आजकल

मीठी यादों के दर्द में लिपटा,

प्यार रूठा रहता है। 

Thursday, June 24, 2021

तुम क्या गये!!

 तुम क्या गये!

रूठ गयी जिन्दगी मुझसे

दुनिया की नजरों में

हौसला बनकर उभरी थी

परिहास बनकर रह गयी हूं।

Photo by Wendy Wei from Pexels











तुम क्या गये!

घना हो चला है

दर्द का सघन वन।

तुम थे तो 

आँच न आती थी मुझ पर

झुलस रही हूं आज मैं।


तुम क्या गये!

चली गयी मेरी

सारी सकारात्मकता

मेरा हौसला

मेरी हँसी

मेरी खूबसूरती

मेरा जीवन।

Wednesday, June 23, 2021

शब्द प्रेम

तुम शब्द को उछालते हो,

मैं शब्द को अंक में सहेजती हूं।


तुम शब्द को बुद्धि से जलाते हो,

मैं शब्द को मन-मधु पिलाती हूं।

Photo by cottonbro from Pexels











तुम शब्द को निःसहाय छोड देते हो,

मैं शब्द की सहचरी बन जाती हूं।


पर तुम क्यों जीत जाते हो बार-बार,

जबकि मैं परायज वहन करती हूं।

Tuesday, June 22, 2021

अनचाहा

 सिन्दूर की लाली से दमकता चेहरा,

लाज से सकुचाये अधर,

सिहरन से थिरकता गात,

तुम्हें लुभाते नहीं।

Photo by Amine M'Siouri from Pexels











मेरे चेहरे से तुम्हें जात की बू आती है,

अधरों से अनकहे उल्हाने सुन लेते हो तुम,

गात पर मेरे कई करों की प्रतिलिपि दिखाती है तुम्हें,

तुम्हारे दिमाग की यह नाजायज सन्तान

कतई मंजूर नहीं है मुझे

नहीं/ बिल्कुल भी नहीं!


सीधी मीठी बातें,

प्रेम में सना बाहुपाश,

श्रद्धा की भावना से भीगी दृष्टि,

तुम्हें प्रभावित नहीं करते।


मेरी कही में तुम्हें प्रपंच सुनाई देता है,

बाहुपाश विधर्मी भाषा का फंदा लगता है तुम्हें,

दृष्टि की कपटता तुम साफ भाँप लेते हो,

तुम्हारे मन की गिरह में कैद यह राक्षस, 

कदापि स्वीकार नहीं है मुझे

नहीं/ किंचित भी नहीं!

गुजारा

 सुबह की पहली किरण आँगन से निकलती हुई भीगी मिट्टी की सोंधी-सोंधी खुशबू से नींद खुलती है। photo credit pixbay from pexel दिन चढता  भीगी मिट्ट...